ईमान , जमीर , सच्चाई , ईमानदारी
किस जमाने की बात करते हो ?
है कोई अब समझने वाला इनकी कीमत ,
क्यों बेकार की बात करते हो।
सब कुछ तो गिरवी रख दिया हमने अब ,
इस अंधाधुंध दौड़ में ,
तरक्की की खातिर ,
कब से नाता तोड़ लिया है।
झूठ , स्वार्थ , लालच , दोगलापन
अब इस नए ज़माने के गुण है ,
आगे बढ़ने के लिए ,
यही अब जरुरी है।
मत पढ़ाओ किताबी बातें अब ,
नए ज्ञान के अब नए शिखर है ,
पुराने जीवन मूल्यों की अब ,
किसको यहाँ क़द्र है ?
रिश्ते सिमट गए थैली में ,
संस्कारो की नित नयी होली है ,
दुसरो की भावनाओ से खेलने की ,
आयी एक नयी बीमारी है।
चल रहे है जो अब भी उसूलो से ,
उनको हाशिये में धकेलने की पुरजोर तैयारी है ,
इक्कसवी सदी में देखो ,
धक्कामुक्की का खेल जारी है।
जीवन की बुनियाद दरक रही ,
अटालिकाएँ बनना जारी है ,
खोखली दीवारों पर ,
दिखाऊ और चमकदार रंगरोगन जारी है।
है अभी भी कुछ लोग ,
जो जीवन का मर्म समझते है ,
लगे हुए है चुपचाप अपना ,
बाकी लोग उन्हें पुरातन समझते है।
टिका है बस उन्ही के कंधो पर,
ये भार है ,
कब तो वो भी ढोयेंगे ,
ये बड़ा सवाल है।








