Thursday, February 21, 2019

कदम



रास्ते खुलेंगे , 
कदम तो बढ़ा , 
एक रास्ता बंद तो क्या , 
नए रास्ते बना।  

कम तू किसी से नहीं , 
'कमी तुझमे' ये भ्रम , 
कर सकता है सब कुछ , 
संकोच मत रख कोई मन में।  

रोड़े आयेंगे राहो में , 
सब्र का इम्तेहां होगा , 
हौंसला तुलेगा ज़िन्दगी तराजू में ,
तब "तू" निखरेगा।  

गढ़ेगा तेरे नाम का पत्थर भी , 
जीवन सफर की राहों में , 
संघर्ष और जूनून से , 
अपने को इस लायक तो बना।  

हार जीत , सफलता -असफलता 
ये तो जीवन राह के पड़ाव है , 
ज़िन्दगी तो चलती जानी है , 
"विजय यात्रा " तो तुझे खुद बनानी है।   

Tuesday, February 12, 2019

मैं अयोध्या हूँ




रघुकुल गौरव , 
रामराज्य की साक्षी , 
मैं  कौशलपुर साकेत नगरी हूँ, 
मैं अयोध्या हूँ।    

मैं रामजन्मभूमि -कर्मभूमि 
सीता का ससुराल ,
राजा दशरथ का वचन हूँ, 
मैं अयोध्या हूँ।  

त्रेता युग से कलयुग ,
न जाने कितनी बार ढही , 
फिर भी सरयू तट पर तन कर खड़ी हूँ,
मैं अयोध्या हूँ।  

खड़ाऊं से सिंहासन , 
वो भ्रातप्रेम , 
उच्च आदर्शो के प्रतिमानो  के खम्बो पर टिकी हूँ , 
मैं अयोध्या हूँ।  

राम बसे मेरे कण कण में , 
वैभवशाली इतिहास ,
मैं रामराज्य की अंतिम धरोहर हूँ , 
मैं अयोध्या हूँ।  

Tuesday, February 5, 2019

मसले

बहुत मसले यूँ ही हल हो जाते ,
अगर " मैं " से "हम " हो जाते।  

कितने रिश्ते यूँ ही नहीं बिखरते , 
थोड़ा वो और थोड़ा तुम झुक जाते।  

पछतावा अब करने से क्या फायदा , 
उस समय जरा हिम्मत कर जाते।  

ज़िन्दगी की राह कितनी आसान हो जाती , 
अगर गलतियों से सबक सीखे होते।  

माना बहुत चुनौतियाँ है राह में , 
अपने दम ख़म को परखे तो होते।  

तमाम खूबियों से नवाजा ईश्वर ने आपको , 
वक्त रहते फैसले लेते तो आज कहाँ होते। 


Friday, January 11, 2019

अभिलाषा



जब सांझ आये जीवन की भगवन , 
बस इतनी कृपा हो , 
फक्र कर सकूं , सीना चौड़ा 
जीवन पर अपने गर्व हो।  

याद करूँ अपने जीवन पथ को , 
गर्व की अनुभूति हो , 
कर्मो के मेरे जीवन पथ  पर , 
कही कोई सिसकी न हो।  

याद करे अगर लोग तो , 
उनकी मधुर स्मृतियो में हो , 
ठेस पहुँचायी हो गर किसी को , 
वो भी भुलाने लायक हो।  

बंद मुट्ठी बाँधे जन्मा था , 
खाली हाथ ही जाना है , 
जीवनपथ का पथिक निरंतर , 
तुझ पर कभी संशय न हो।  

क्या हारा , क्या जीता 
क्या खोया , क्या पाया 
जीवन इससे उन्मुक्त , 
अपने जीवन पथ पर गर्व हो।

जीवन की उस साँझ में ,
शांति  और सुकून हो , 
जीवन जो दिया तूने , 
"भरपूर जीये"- तसल्ली हो। 

छायाचित्र आभार - गूगल 

Sunday, January 6, 2019

कैसा दौर?




काल खंड का ये कैसा दौर आया ? 
सच पर झूठ की संगीन छाया,
 छल प्रपंच और मक्कारी ,
 सीधे सादे लोगो को ढोंगियों ने भरमाया।
  
पिस रहा मानस अपने बोझ तले ही ,
 इच्छाओ की अनंत पराकाष्ठा , 
लगी हुई है दौड़ भयंकर ,
भस्मासुर बन शिव को तलाश रहा।

नैतिकता को तिलांजलि देकर ,
मानवता को दंश लग रहा , 
स्वार्थ की महिमा ऐसी चढ़ रही , 
खुद के अस्तित्व पर संकट छा रहा।

असत्य , सत्य को दबा रहा , 
ढोंगी और प्रपंचियों का बोलबाला , 
आभासी दुनिया के मकड़जाल में , 
पिस रहा सहज मनुष्य भोलाभाला।

 प्रकृति के साथ खेल भयंकर , 
कुरेद डाला उसका  मन , 
अट्टहास हो रहा अट्टालिकाओं से, 
जर जर हो गया तन।

रिश्ते सब मर्यादा लांघ चुके , 
दर्द से अब कोई नहीं पसीजता , 
मानवता अब किताबी रह गयी , 
आँखों से अब "सच्चा " आँसू नहीं आता।

भ्रमित सा चौराहे पर खड़ा , 
कोई रास्ता नहीं सूझ रहा , 
जिधर देखी भीड़ - चल दिया , 
भेड़चाल में "मानुस " जी रहा।

 गवाही देगा जर्रा जर्रा , 
कण कण सच उगलेगा , 
खुदेगी जब मिटटी कालांतर , 

परत दर परत "काला  सच" उभरेगा।    

Wednesday, December 26, 2018

नवोदय तुझे प्रणाम




ऐ मेरे स्कूल तुझे शुक्रिया नहीं कहूंगा ,
क्यूंकि तुम मुझसे अलग कभी हुए ही नहीं ,
तुझे ही जीता हूँ मैं आज भी ,
मन तो तेरे आँगन छोड़ आया था तभी। 

तेरी आँगन की मिटटी की महक ,
आज भी याद है मुझे ,
तेरी दीवारों पर मेरे लिखे शब्द ,
पता है मेरी याद में छुपाये है कही। 

मेरी शैतानियों को याद कर ,
सिसकता है तेरा रोम रोम भी ,
मेरी खिलखिलहाट गूंजती है ,
तेरे गलियारे में आज भी। 

हाँ , ज़िन्दगी के सफर में बहुत आगे निकल गया हूँ ,
तेरे नाम की विरासत जो लिए चल रहा हूँ ,
बढूंगा और आगे बढूँगा ,
सीखा तेरे आँगन से ही। 

मगर , ये तुझे भी पता है ,
और मुझे भी ,
हम दोनों कभी न अलग हुए थे , न होंगे
बस तू मेरी यादों को संभाले रखना ,
मैं तेरे नाम का परचम लहराता हूँ कहीं। 

बस तेरे जर्रे जर्रे को प्रणाम करना चाहता हूँ ,
नमन हर कण कण को करता हूँ ,
एहसानमंद हूँ तेरा हर पल ,
बस खुद को ' नवोदयन ' करना चाहता हूँ। 


Wednesday, December 19, 2018

शिखर


वो यूँ ही शिखर पर नहीं पहुँचा होगा ,
कितना संघर्ष ,
कितना त्याग ,
कितने ताने ,
कितनी मेहनत ,
हर सीढ़ी पर अपना कलेजा रखा होगा ,
वो यूँ ही शिखर पर नहीं पहुंचा होगा। 

वो जज्बा ,
वो हिम्मत ,
वो जूनून ,
वो पागलपन ,
वो खुद पर विश्वास हर कदम रखा होगा ,
वो यूँ ही शिखर पर नहीं पहुंचा होगा। 

सीखने की ललक ,
हर हार से सबक ,
निराशा में आस की किरण,
हार में जीत की झलक,
हर परिस्थिति से पार पाया होगा ,  
वो यूँ ही शिखर पर नहीं पहुंचा होगा।  

Thursday, December 13, 2018

जीत



हारा नहीं तू अभी ,
वक्त अभी फिसला नहीं ,
हाँ, थोड़ा ताकत और लगानी पड़ेगी ,
अगर तुझे कोई गुरेज नहीं ,
वो देख , मंज़िल तुझसे मिलने के लिए ,
बाहें खोले है खड़ी। 

कौन आगे निकल गया ,
किसने क्या पा लिया
ये उनकी मेहनत और किस्मत ,
तूने भी मेहनत की ,
थोड़ा सा ही शायद रह गयी कमी। 

चल , उठ और फिर खड़ा हो ,
उम्र कोई बाधा नहीं ,
होंगी परिस्थितियां विपरीत भले ही ,
कर्मयोद्धा बन ,
लड़कर जीतना ही सही। 

याद रख इतिहास वो ही रचते है,
जो जज्बा और जूनून रखते है ,
कर्मो से अपने जो तूफ़ान उठाते है ,
बस वही याद रह जाते है। 



Monday, December 10, 2018

सुनो , आपसे कुछ कहना है



सुनो , आपसे कुछ कहना है
हाँ , हाँ , आपसे से ही ,
इधर उधर बगले मत झांको ,
तुम्हारे सिवाय और किसी से नहीं ,
आज और अभी कुछ कहना है। 

तुम जो इतना व्यस्त दिखा रहे हो खुद को ,
उतना तुम हो नहीं ,
जबरदस्ती की कोशिश मत करो ,
आज मुझसे पल्ला छुड़ाने की। 

सबके लिए समय है तुम्हारे पास ,
क्या मेरे लिए कुछ भी नहीं ,
चौबीस घंटे साथ रहता हूँ तुम्हारे ,
फिर भी तुम्हे मेरी कोई क़द्र नहीं। 

किसी दिन रूठ गया ना ,
बहुत पछताओगे ,
ये जो नौटंकी रोज करते हो ना ,
फिर कभी न कर पाओगे। 

दिल हूँ तुम्हारा ,
कभी मेरी भी सुन लिया करो ,
कभी कभी मुझसे भी ,
एकांत में मिल लिया करो। 

बहुत समय से हम एक दूसरे से  मिले नहीं ,
इसलिए तुम खुश कम और परेशान ज्यादा रहते हो ,
दिमाग के बहकावे में हर समय गुलाम से रहते हो ,
मिलो कभी  हम तुम्हे " खुद से " मिलवाते है।  

प्रश्न



अब स्वर्ग से नहीं उतरेंगे
फरिश्ते ,
और न पाताल से जन्मेंगे
राक्षस,
इसी पृथ्वी पर ,
धरती और आकाश के बीच
जन्मेंगे ,
पनपेंगे ,
और ,
नियति को पाएंगे ,
सब ,
इर्द गिर्द ,
मौजूद रहेंगे ,
हर वक्त ,
फरिश्ते ,
और राक्षस ।

नजर पैनी चाहिए ,
जो पहचान सके ,
कौन फरिश्ता
और कौन राक्षस ,
न रंग में भेद होगा ,
न फ़रिश्तो के पर होंगे ,
राक्षस अट्टहास नहीं करेंगे ,
बड़ी मुश्किल ,
पहचानने में ,
किसके अंदर छुपा क्या है ,
कौन छुपाये बैठा है खंजर ,
किसकी नीयत क्या है ?
किसी को नहीं खबर ,
मानुष के रूप में ,
फरिश्ता भी है ,
और राक्षस भी। 

तय नहीं है अब
श्वेत वस्त्र में फरिश्ते ही होंगे ,
काले कपड़ो में सिर्फ ,
राक्षस ही मिलेंगे ,
बदल गयी है दुनिया ,
बदल गया है समाज ,
खुद ही संभल कर ,
चलिए ,
खुद ही पहचानना होगा ,
कौन फरिश्ता ,
और
कौन राक्षस,
कौन दोस्त ,
और ,
कौन दुश्मन। 

हां , मुश्किल है थोड़ा ,
मगर असंभव नहीं ,
खुले रखिये अपने पाँचो इन्द्रियाँ ,
संकेत मिलेंगे वहीँ,
पहचान जायेंगे आप ,
कौन गलत  ,
और ,
कौन सही।


Wednesday, December 5, 2018

मुस्कराइये , आप ज़िंदा है


माना की अँधेरे बहुत है , 
मगर रोशनी के लिए तो , 
एक जुगनू ही बहुत है।  

माना की दुश्वारियाँ बहुत है , 
मगर मुस्कराने के लिए तो , 
एक बहाना ही बहुत है।  

माना की हारे बहुत बार है , 
मगर पीठ थपथपाने के लिए , 
एक कदम भी चले है तो बहुत है।  

माना की कोई साथ नहीं है , 
मगर हौंसला देने के लिए , 
जूनून और ज़िद्द ही बहुत है।  

माना की सारे दुश्मन है , 
मगर अब भी वो बचपन का दोस्त ,
जिसे तुम भूल गए हो , बहुत है।  

माना की रातों की नींद गायब है , 
मगर सोने के लिए , 
माँ की  थपकी की याद ही बहुत है।  

माना की ज़िन्दगी थोड़ा कठिन है , 
मगर स्वस्थ हो , 
कदम बढ़ाने के लिए यही बहुत है।  

Saturday, December 1, 2018

मेरे स्कूल की ईमारत



खंडहर हो गया बचपन ,
बस कुछ निशान बाकी है ,
नवनिर्माण के लिए देखो ,
एक इतिहास दफ़न हो गया। 

ये दीवारे जो कभी बोलती थी ,
ये गलियारा जो गुंजायमान था ,
इन खम्बो ने सिसकियाँ सूनी थी कभी ,
इन दीवारों की सेल्फो में किताबे सजी थी। 

जमींदोज हो गयी ये ईमारत ,
जो कभी हमारे लिए महल हुआ करती थी ,
जर्रे जर्रे पर लिखी हुई थी हमारे सपनो की कवायद ,
आज सुनसान अपने हालात पर रो रही थी। 

लेकिन ये तो शास्वत सत्य है ,
एक न एक दिन इसे ढहना ही था ,
नव निर्माण के लिए रास्ता देना ही था ,
एक इतिहास बनना ही था। 

शुक्रिया और नमन जर्रे जर्रे को ,
खुद ढहकर हमें बना दिया ,
हमारे सपनो को पूरा करते करते ,
देखो पत्थर भी गिरकर हमारे दिल में "घर " कर गया।


फोटो आभार - ओम , ज न वि भूतपूर्ण छात्र 

Thursday, November 22, 2018

मेरे दस "बब्बर " शेर


कुछ सबक ज़िन्दगी ने सिखाने थे ,
वो हर कदम पर परीक्षा लेती रही ,
हम भी दिलेर इतने ,
हर परीक्षा में पास होते रहे। 

लेती रह ज़िन्दगी
हर कदम पर इम्तेहान कई ,
तुझे भी पता है हार नहीं मानूंगा मै ,
तू भी तो थकेगी कहीं। 

उड़ चले परिंदे पंख लगते ही ,
पुराने घौंसले से अब कहाँ उन्हें मोह था ,
अब आ गया था मौसम नया ,
नया बेहतर घौंसला जो बसाना था।

तू अपनी फिक्र कर "आनन्द ",बाकि दुनिया मौज में है।
तेरी ही नजरो में खोट है शायद , सब जगह तो चैन है। 

कुछ किताबें रटकर जीवन परीक्षा में उतरे तो थे ,
मगर यहाँ तो हर प्रश्न का उत्तर किताबो से जुदा निकला। 

अच्छा हुआ की उन्होंने बेवफाई की ,
हम तो उन्ही को अपनी दुनिया मान बैठे थे ,
उतरा जब ये चश्मा ,
दुनिया में और भी कई रंग थे। 

रुखसती से पहले ये जरूर बता देना ज़िन्दगी ,
इतना दौड़ाया क्यों था ,
गुजर सकती थी जो रातें सुकून में ,
जगाया क्यों था। 

हम तो नियम से चल रहे थे ,
उसूलो को सच मान बैठे थे ,
हमें बड़ी देर से पता चला ,
नियम और उसूल हर एक के अपने अपने थे। 

अभी चर्चे न हुए तो क्या हुआ ,
दस्तूर जमाने का है
ज़िंदा रहते कोई पूछे , न पूछे
चले गए तो फोटो में हार जरूर है। 


१०
ये नौकरी है साहब , नौ "कर" भी देने है
बाकि जो बच जाये  , बस वही अपने है।    

Thursday, November 15, 2018

वो तुम्हारे साथ है।


जब सारे रास्ते बंद दिखे , 
उम्मीद की हर किरण धुले , 
जीवन एक बोझ सा लगे , 
तब एक हलकी सी दस्तक सीने में , 
आशा बनकर उभरे , 
तब समझ जाओ , 
वो तुम्हारे साथ है।  

जब हिम्मत टूटने लगे , 
हौंसला साथ छोड़ने लगे , 
सब कुछ बड़ा बेमानी सा लगने लगे , 
अचानक एक आँसू गिरकर , 
चमकने लगे , 
दिल थोड़ा सा हल्का लगने लगे , 
तब समझ जाओ , 
वो तुम्हारे साथ है।  

घुप्प अँधेरा हो , 
कहीं कुछ दिखाई न दे , 
सब अमावस की काली रात लगे , 
तब कही दूर एक टिमटिमाता जुगनू भी दिखे , 
तब समझ जाओ , 
वो तुम्हारे साथ है।  

जब सब साथ छोड़ दे , 
अकेला ये जहाँ लगने लगे , 
सारे रिश्ते नाते दूर के लगने लगे , 
तब आपको माँ का चेहरा  दिखे , 
तब समझ जाओ , 
वो तुम्हारे साथ है।

जब खुद के वजूद पर संदेह हो जाये ,
अपने होने का अर्थ समझ न आये ,
सबसे बुरा ख्याल मन में आये  ,
तब आपको किसी लाचार और मजबूर का चेहरा याद आये ,
तब समझ जाओ , वो ज़िन्दगी का दाता
आपके साथ है।    

Image source - google

Tuesday, November 13, 2018

ख्वाइशें और हकीकत


ख्वाईशो का समंदर टकरा गया इक दिन ,
हकीकतों की चट्टानों से ,
ऐसा मंथन हुआ दोनों का ,
दोनों में ठन गयी ,
थक गए जब दोनों , 
सुलह के रूप में ,
एक नदी की धार निकली ,
समंदर से पानी लेकर ,
चट्टानों के बीच से ,
अपना रास्ता बनाकर ,
वह सपाट मैदानों में बह निकली ,
स्वछंद और मदमस्त बहाव से ,
किनारो को मुस्कान देकर ,
वह जीवन सागर से मिलने चल दी। 

अब न उसपर ख्वाईशो का बोझ है  ,
हकीकत से  वास्ता जोड़ लिया है ,
अब तो उसे अपनी रौ में बहना है  ,
जो मिलना है  रास्ते में ,
अपने में समेटकर  तरना है। 

कितना सरल है जीवन का यूँ बहना ,
न जाने कठिन कैसे हो जाता है ,
फिर वही मंथन , फिर टकराव,
जीवन का बहाव थम सा जाता है।

ख्वाईशो और हकीकत में सामंजस्य रखिये ,
जीवन को सरल और बहने दीजिये ,
आपको भी जीवन जीने का मजा आएगा ,
जीवन भी अपना अर्थ पा जायेगा।